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उत्तराखंड की महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण पर हाईकोर्ट की रोक

प्रदेश की विभिन्न सरकारी नौकरियों में महिलाओं के 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रोक के निर्देश दिए है। इसका परिणाम यह हुआ है कि प्रदेश के विभिन्न विभागों में लगभग 8 हजार रिक्त पदों की नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हाईकोर्ट के इस फैसले का उत्तराखंड लोक सेवा आयोग, उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और चिकित्सा चयन आयोग आदि विभागों की प्रस्तावित और चल रही नियुक्तियां प्रभावित होगी।

कुछ नियुक्तियों की आवेदन प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है और कुछ की शीघ्र आवेदन प्रक्रिया आरम्भ होने वाली है। सरकार द्वारा दिसंबर 2018 में राज्य आंदोलनकारियों के आरक्षण को कोर्ट के आदेश के बाद निरस्त कर दिया था। इसके पूर्व आयोग द्वारा सहायक लेखाकार, आबकारी लेखाकार, आबकारी एवं परिवहन विभाग प्रवर्तन सिपाही और व्यक्तिक सहायक आदि पदों के लिए परीक्षा कराई जा चुकी है।

अनारक्षित श्रेणी के लिए दो कटऑफ सूची

एक याचिका करता के अनुसार ली गयी परीक्षा के लिए अनारक्षित केटेगरी की दो कटऑफ लिस्ट प्राप्त हुई है। उत्तराखंड की मूल निवासी महिला उम्मीदवार की कटऑफ 79 रही थी। इसके बावजूद महिला याचिकाकर्ता के 79 से अधिक अंक होने पर भी अयोग्य घोषित किया गया है।

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मामले की पृष्टभूमि

याचिकाकर्ताओं के वकील कार्तिकेय हरिगुप्ता के अनुसार प्रदेश सरकार की तरफ से 2001 और 2006 में शासनादेश आया था। इसके अनुसार उत्तराखंड मूल की महिला को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देना संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 एवं 21 के विरुद्ध है। अनुच्छेद 15 व 16 के अंतर्गत कोई राज्य आवास के आधार पर आरक्षण नहीं प्रदान कर सकता है, यह अधिकार संसद के पास है। राज्य सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़े लोगों को ही आरक्षण दे सकता है।

इन नियुक्तियों में आंदोलनकारी कोटे के अंतर्गत उमीदवारो ने आवेदन किया था। इसके बाद सम्बंधित पदों के लिए लिखित परीक्षा के आयोजन के बाद युवाओं को चयनित भी किया गया। इसी बीच आरक्षण के समाप्त होने पर उम्मीदवारों का परीक्षा परिणाम जारी नहीं हुआ। तब से लेकर अब तक आयोग के पास परीक्षा परिणाम फाइल में ही बंद पड़े है।

वही सरकार के अनुसार, राज्य की महिलाओं को आरक्षण देना संवैधानिक कदम है।

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