राजस्थान विधानसभा चुनावो में पिछले तीन इलेक्शन में 80 प्रतिशत प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए है।

राजस्थान विधानसभा चुनावो में पिछली बार के तीन इलेक्शन को देखने पर ये चलन देखने को मिला है कि 2,200 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाते है और इनमे से 1,800 की तो जमानत भी जब्त हो जाती है। इनमे से भी 600 उम्मीदवार तो ऐसे रहते है जोकि अपनी एप्लीकेशन भी वापस ले लेते है।

पिछली बार के विधानसभा चुनावो में 579 प्रत्याशियों ने अपने आवेदन वापस मांगे थे। फिर इलेक्शन में 2294 ही चुनावी मैदान में थे और इनमे से भी 1,839 प्रत्याशियो की जमानत जब्त हो गई थी। उम्मीदवारो में 138 महिलाएँ भी शामिल रही।

पिछले तीन इलेक्शन की स्थितियाँ

  • सबसे पहले 2008 में हुए विधानसभा इलेक्शन की बात करें तो इसमें 2194 प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। किन्तु इन लोगो में से 1730 की तो जमानत ही जब्त हुई थी यानी कि 78.51 प्रतिशत उम्मीदवार।
  • इसके अगले ही 2013 के चुनावों में 2296 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे और ईनमसे से 1843 प्रत्याशी यानी 80.04 प्रतिशत भी अपनी जमानत तक बचने में असफल रहे थे। जयपुर में 86 प्रतिशत उम्मीदवारो की जमानत जब्त हुई थी।
  • पिछली बार के चुनाव यानी 2018 में 2294 उम्मीदवारो ने अपनी किस्मत आजमाई किन्तु इनमे से 80.18 प्रतिशत प्रत्याशी यानी 1839 भी अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे।

जमानत जब्ती में जयपुर सबसे आगे

पिछली बार के विधानसभा इलेक्शन को देखने पर पता चलता है कि सर्वाधिक जमानत जब्ती के मामले जयपुर जिले में हुए है। यहाँ पर 305 उम्मीदवारो की जमानत नहीं बच पाई है। दूसरे नम्बर पर अलवर जिला है जिसमे 118 उम्मीदवारो को ऐसे स्थिति देखनी पड़ी है।

इसके अलावा नागौर के 88, सीकर के 87, अजमेर के 78, बीकानेर, झुंझुनूं एवं चूरू के 73-73 प्रत्याशियों को जमानत जब्त करवानी पड़ी है।

जमानत जब्त होने का मतलब जाने

इलेक्शन कमिशन का यह नियम है कि अगर किसी इलेक्शन में प्रतिभाग कर रहे उम्मीदवार को उसकी सीट पर कुल मत का 1/6 मतलब 16.66 फ़ीसदी मत नहीं मिलने पर कमिशन उस उम्मीदवार की जमानत राशि की जब्ती कर देता है।

जैसे कि किसी विधानसभा सीट में 1 लाख वोटर्स ने मतदान किया और यहाँ पर 7 प्रत्याशियों को 16,666 से भी कम मत मिलते है तो इनकी जामनत राशि की जब्ती होगी।

पिछली बार 1.3% नोटा ने सभी का गणित बिगाड़ा

पिछली बार के राजस्थान विधानसभा चुनावो में कॉंग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। दोनों के बीच काफी कम मत शेयर होने के कारण से बीजेपी सरकार से निष्कासित हुई थी। इस इलेक्शन में 4,67,785 मतदाताओं ने नोटा को दबाया था। इस बार के नोटा में इससे पिछले चुनाव (2013) से 1,22,147 अधिकता देखी गई है।

2018 के इलेक्शन में बीजेपी को 38.8 फ़ीसदी एवं कॉंग्रेस को 39.3 फ़ीसदी मत प्राप्त हुए थे और दोनों के बीच का वोटिंग अन्तर सिर्फ 0.5 फ़ीसदी ही था। बीजेपी को लगभग 1,37,57,000 मत प्राप्त हुए थे और कांग्रेस को इससे 70 लाख अधिक मत मिले थे। इस प्रकार से इस बार के 1.3 प्रतिशत नोटा ने ही दोनों मुख्य दलों के साथ अन्य दलों का गणित भी ख़राब किया था।

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गठबंधन की कोशिशे जारी – गहलोत

इस बार के चुनावो के लिए कॉंग्रेस राष्ट्रीय लोकदल एवं माकपा के साथ गठबन्धन का सकती है। सीएम अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने पत्रकार वार्ता में इस बात के संकेत जरूर किये है। पिछली बार के चुनाव में पार्टी ने 5 सीटों को गठबन्धन के सहभागियों के लिए छोड़ा था। किन्तु कॉंग्रेस का एक भाग गहलोत के गठबन्धन वाले विचार को लेकर असमहमत जरूर है और इस कारण फैसला भी नहीं हो पा रहा है।

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