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केके और सिधु मूसेवाला के बाद संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी का हुआ निधन

प्रसिद्ध भजन सोपोरी का बृहस्पतिवार को कैंसर की बीमारी के कारण हरियाणा में गुरुग्राम के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे दो जून (भाषा) ‘संतूर के संत’ नाम से प्रसिद्ध थे। उनकी उम्र 73 साल थी। उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे सौरभ तथा अभय हैं। सोपोरी के दोनों पुत्र भी संतूर वादक हैं। उनके पुत्र अभय ने बताया कि उन्हें पिछले साल जून में बड़ी आंत का कैंसर होने का पता चला था। उन्हें तीन हफ्ते पहले ही इम्यूनोथेरेपी उपचार के लिए गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया था परंतु यह कारगर नहीं रहा और उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया।

संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी

अनेक पुरस्कारों से थे सम्मानित

पंडित भजन सोपोरी एक कलाकार, संगीतकार, संगीतज्ञ, शिक्षक, लेखक और कवि थे। उन्हें जम्मू और कश्मीर की संस्कृति को देश के बाकी हिस्सों के साथ जोड़ने के लिए जाना जाता है। 1953 में पांच साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला प्रदर्शन दिया था। अपने कई दशकों के करियर में उन्होंने मिस्र, इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका समेत कई देशों में प्रदर्शन किया।

उन्हें वर्ष 1992 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2004 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 2009 में उन्हें बाबा अलाउद्दीन खान पुरस्कार तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें 2011 में एमएन माथुर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी

भजन सोपोरी का यादगार जीवन काल

पंडित भजन सोपोरी का जन्म 1948 में जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में हुआ था। उनका पूरा नाम भजन लाल सोपोरी था और इनके पिता पंडित शंभू नाथ सोपोरी भी एक संतूर वादी थे। भजन सोपोरी को घर पर ही उनके दादा एससी सोपोरी और पिता एसएन सोपोरी से संतूर की विद्या हासिल हुई। या कह सकते हैं कि संतूर वादन की शिक्षा उन्हें विरासत में मिली थी। दादा और पिता से इन्हें गायन शैली व वादन शैली में शिक्षा दी गई थी।

भजन सोपोरी ने अंग्रेजी साहित्य में मास्टर्स डिग्री हासिल की थी तथा इसके उपरांत वाशिंगटन विश्वविद्यालय से पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का अध्ययन भी किया। कश्मीर घाटी के सोपोर के रहने वाले हैं और अपने वंश को प्राचीन संतूर विशेषज्ञों से जोड़ते हैं। वह भारतीय शास्त्रीय संगीत के सूफियाना घराने से ताल्लुक रखते हैं। उनके परिवार ने छह पीढ़ियों से अधिक समय से संतूर बजाया है। उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन प्रयाग संगीत समिति और इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में हुआ था जब वे 10 वर्ष के थे।

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